Savita's Poetry


 

करके अपना अभिनय पूरा - १९७५

चले जायेंगे बारी बारी करके अपना अभिनय पूरा
लिखी कहानी हर मानव की
क्या है दासी क्या है रानी
करना है हमें राज जगत पर
या भरना है केवल पानी
करी कोशिशें लाखों जन् ने
बात भेद की पर न जानी
किसने है यह लिखी कहानी
पाते हैं सुख अपनी शक्ति से
या पाते हैं ईश भक्ति से
मन् भ्रमित है प्रश्न अनंत हैं
इस मानव का कहाँ अंत है
खेल खत्म हो जाने पर फिर
उतर मंच से कहाँ जायेंगे
कर के अपना अभिनय पूरा
चले जायेंगे बारी बारी
करके अपना अभिनय पूरा

 

अनिश्चितता - २००८

मैं मरूंगी या बचूंगी
गर बची तो फिर मरूंगी
मर गयी तो भी बचूंगी
मैं मरूंगी क्या नया है
जानती थी यह मैं तब से
आयी थी इस जग में जब से
कब मरूंगी प्रश्न यही है
गर मैं जीती ही गयी तो
कौन जाने कब मरूंगी?
गर मैं कल मर भी गयी तो
जीती रहूँगी इक सदी तक
इन् हवाओं में चमन में
आपकी यादों के वन में
अपने स्वजनों के ज़हन में
चाँद तारों के गगन में